Tuesday, February 9, 2010

नामुमकिन है हकीकत

मेरी कबर पे आके तुम आवाज़ नहीं करना
दर्द  की नए दास्ताँ का आगाज़ नहीं करना ...

अपनी बेबस्सी को खुद ही ब्यान करेगा ये
चेहरे को किसी आईने का मोहताज़ नहीं करना ...

राज़ जो खुद से ही न छिपा पाओ तुम
ऐसे राज़ में किसी  को हमराज़ नहीं करना ...

नामुमकिन है हकीकत के आसमान में उरना
खाबों के सहारे इसमें परवाज़ नहीं करना ...

ज़ख़्म फिर ज़ख़्म है .नए रोज़ भर जायंगे
हुसन वालो को इनके चारासाज़ नहीं करना ...

खाख से बने हो खाख में मिल जाओगे
कभी भूले से भी खुद पे नाज़ नहीं  करना ...

Friday, December 11, 2009

हकीकत का आशियाना

फूल मुझे पसंद नहीं,
मै कांटो का दीवाना हू!
मै जलने वाली आग नहीं,
जल जाने वाला परवना हु!
ख्वाब मुझे पसंद नहीं,
मै हकीकत का आशियाना हु!
मै मिटने  वाली हसरत नहीं,
जीने वाला अफसाना हु!
मै थमने वाला वक़्त नहीं,
न छु पाने वाला किनारा हु!
मै रूकने वाली सांस नहीं,
सदा दिल  मे धडकने वाला सहारा हु!...
निगाहे बचाकर जो चलते है हमसे,
कभी उनको हमसे मोहोब्बत हुई थी
जो महबूब से अजनबी हो गए है
कभी उनको हमसे मोहोब्बत हुई थी.
तुझे खोना भी मुश्कील है,
तुझे पाना भी मुश्कील है.
जरा सी बात पर आंखें भीगो के बैठ जाते हो,
तुझे अब अपने दिल का हाल बताना भी मुश्किल है,
उदासी तेरे चहरे पे गवारा भी नहीं लेकीन,
तेरी खातिर सितारे  तोड़ कर लाना भी मुश्किल है,
यहाँ लोगों ने खुद पे परदे इतने डाल रखे हैं,
किस  के दिल में क्या है नज़र आना भी मुश्किल है,
तुझे जिंदगी भर याद रखने की कसम तो नहीं ली,
पर एक पल के लिए तुझे भुलाना भी मुश्किल है .

Friday, November 20, 2009

एक बोध कथा

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय " हमें याद आती है ।


दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...


उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की   बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ... आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई   है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ .. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –

इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....
टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं ,

छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और
रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..

अब यदि तुमने काँच की बरनी में   सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ...

ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने   बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ...... पहले तय करो कि क्या जरूरी है ... बाकी सब तो रेत है ..

छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच   ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...

इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।    

( अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो .... मैंने अभी - अभी यही किया है )

आपका मित्र

Thursday, October 29, 2009

ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,

ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,
हर बात समझाने के लिए नही होती,
याद तो अक्सर आती है आप की,
लकिन हर याद जताने के लिए नही होती
महफिल न सही तन्हाई तो मिलती है,
मिलन न सही जुदाई तो मिलती है,
कौन कहता है मोहब्बत में कुछ नही मिलता,
वफ़ा न सही बेवफाई तो मिलती है
कितनी जल्दी ये मुलाक़ात गुज़र जाती है
प्यास भुजती नही बरसात गुज़र जाती है
अपनी यादों से कह दो कि यहाँ न आया करे
नींद आती नही और रात गुज़र जाती है
उमर की राह मे रस्ते बदल जाते हैं,
वक्त की आंधी में इन्सान बदल जाते हैं,
सोचते हैं तुम्हें इतना याद न करें,
लेकिन आंखें बंद करते ही इरादे बदल जाते हैं
कभी कभी दिल उदास होता है
हल्का हल्का सा आँखों को एहसास होता है
छलकती है मेरी भी आँखों से नमी जब
तुम्हारे दूर होने का एहसास होता है
ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,
हर बात समझाने के लिए नही होती,
याद तो अक्सर आती है आप की,
लकिन हर याद जताने के लिए नही होती
महफिल न सही तन्हाई तो मिलती है,
मिलन न सही जुदाई तो मिलती है,
कौन कहता है मोहब्बत में कुछ नही मिलता,
वफ़ा न सही बेवफाई तो मिलती है
कितनी जल्दी ये मुलाक़ात गुज़र जाती है
प्यास भुजती नही बरसात गुज़र जाती है

पगली लड़की

अमावास की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है ,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसूं के संग होते हैं,
जब पिछवाडे के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घडियां टिक -टिक चलती हैं, सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब उंच- नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती हैं,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भरी लगता है ।

जब पोथे खली होते हैं, जब हर सवाली होते हैं,
जब ग़ज़लें रास नहीं आतीं, अफसाने गाली होते हैं ।
जब बासी फीकी धुप समेटें दिन जल्दी ढल जाता है
,जब सूरज का लास्खर छत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कॉलेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है ,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मना करने पर भी पारो पढने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।

जब कमरे में सन्नाटे की आवाज सुनाई देती है,
जब दर्पण में आँखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बडकी भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो दिनभर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते हैं, हम जाते हैं, घबराते हैं ,
जब साडी पहने एक लड़की का एक फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मानती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भरी लगता है।

दीदी कहती हैं उस पगली लड़की की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जज्बात नहीं,
वोह पगली लड़की 9 दिन मेरे लिए भूखी रहती है,
छुप - छुप सारे व्रत करती है, पर मुझसे कभी न कहती है,
जो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
लेकिन में हूँ मजबूर बहुत, अम्मा - बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा,
यह कथा - कहानी किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लड़की के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के भीं मरना भी भारी लगता है,

Thursday, October 22, 2009

"CTRL + ALT + DEL "

Have you ever thought of the person who invented "CTRL + ALT + DEL " key combination.
"David Bradley"
He is the One who spent 1 minute and 23 seconds in writing the source code that rescues

The world's PC users for decades This extraordinary IBM employee is retiring on Friday, 25th March 2005 after a prolong service of 29 years।

His formula forces obstinate computers to restart when they no longer follow other commands.
By 1980, Bradley was one of 12 people working to create the debut.

The engineers knew they had to design a simple way to restart the computer When it fails to respond the user Bradley wrote the code to make it work.
Bradley says. "I did a lot of other things than Ctrl-Alt-Delete, but I'm famous for that one."
His fame and success is achieved each time a PC user fails.

He Commented His relationship with Bill gates by saying
"I may have invented it, but Bill gates made it famous by applying my formula When ever any Microsoft's Windows operating system made by him CRASHES,
Thus I win when ever he looses..........."

Wednesday, September 30, 2009

वक्त गुज़र जाता है

वो यारो की महफिल,
वो मुस्कुराते पल,
दिल से जुदा है अपना बिता हुआ कल
कभी ज़िन्दगी गुज्जरती थी वक्त बिताने में,
आज वक्त गुज़र जाता है चनद कागज के नोट कमाने में......
...............................................

कोई है जो दुआ करता है,
अपनों में हमे भी गिना करता है,
बहुत खुशनसीब समझते है ख़ुद को,
दूर रह कर भी कोई याद किया करता है...
...............................................

क्यो हमे किसीकी तलाश होती है,
दिलको किसीकी आश होती है चाँद को देखो,
व्हो भी तनहा है,
जबकि उसकी चांदनी से रोज मुलाकात होती है
...............................................

कांच को चाहत थी पत्थर पाने की,
एक पल में फ़िर टूट कर बिखेर जाने की,
चाहत बस इतनी थी उस दीवाने की,
अपने हजार टुकडो में उसकी हजार तस्वीर सजाने की।